सोमवार, १९ अक्तूबर २००९

तनहा है कोई!

तनहा है कोई!
एक अरसे के बाद यूँ ही
कुछ दरख्तों के बीच
हवा गुजर सी जाती है
हौले से
बिलकुल पास से...

लगता है दूर
कहीं तनहा है कोई
शायद भीड़ में
बिलकुल तनहा
या फिर उन चिट्ठियों से दूर,
जिन्हें कभी हम लिखा करते थे
या बार-बार देखा करते थे
छुपा कर
घर या पीछे वाले बगीचे के
किसी कोने में

पोस्टमैन की घंटियों में
ढकी बैचैनी
बेहद अकेले में भी होता था
भीड़ का अहसास

पर इन चिट्ठियों की शक्ल
कुछ गुम सी हो गयी
मंद-मंद झोंके वाले डाकिये जैसी
महसूस तो होता है
सबको कि तनहा है कोई
जब चलती है हवा बिलकुल छूकर...

शनिवार, २२ अगस्त २००९

डॉली



एक भेड़ क्लोनिंग वाली,
आदम जात में भी किसी भेड़ की तरह ही
कोई १४-१५ साल की
किसी मेमने की तरह ही भोली, सुन्दर!

महरूम अपने अधिकारों से
सिर पर अपने पूर्वजों की तरह ही
दूसरों की विष्ठा ढोने को मजबूर
अपने ही समाज में अलग-थलग एक क्लोन की तरह.

जाति प्रथा का नायाब नमूना २१वीं सदी में
अजायबघर से परे,
राजस्थान के किसी छोटे से कसबे में
हजारों वर्षों पुराने शोषण के क्लोन की मानिंद.

डॉली,
क्लोन की इस
छवि को तोड़ने को बेताब
लड़ती है खुद से, अपने घर से,
समाज से
मुट्ठी भर लोगों के साथ के सहारे.

क्लोन तो बदल जाता है,
पर चस्पां हो जाता है उसके माथे पर
हजारों वर्षों से चली आ रही
मानव-क्लोनिंग का दाग
उसकी सीमा रेखा को बाँधने को
शायद हमेशा के लिए!

(डॉली, एक छात्रा है और अपने तबके को शिक्षित करने और उसे रोजगारपरक काम के शिक्षण का काम भी करती है. पिछले दिनों उसने अपनी आपबीती लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के समक्ष एक कार्यक्रम के दौरान रखा था)

शनिवार, २५ जुलाई २००९

यादें

यादें
शहतूत के इस पेड़ से
लिपटी हुई वो यादें
रेशम के कोयों जैसी
बेहद मुलायम,
मीलों लम्बी,
कुछ डरी-डरी सी
गोया बाहर आने से
मिटने का खतरा हो

यादें
उस पतझड़ की
जब शहतूत के सारे पत्ते
झड़ जाते थे
किसी ठूंठ के मानिंद
तब कोई बुलबुल,
कोई नयी सी चिडिया
गाती थी उन ठूंठों पर
कुछ प्रेम-गीत सा

तुम
कहती थी देखना इसमें
कोंपलें आयेंगी
बिलकुल नयी सी, हरी-हरी
पर ये कोंपलें नहीं
तुम्हारे प्यार का अहसास है
जो फुनगियों पर चढ़कर
पहुंचेगा मुझ तक
पीछे वाले झरोखे से

जब भी देखना
इन कोंपलों को,
समझना मैं हूँ तुम्हारे पास
हर पल बिलकुल नयी सी, हरी
या याद कर रही हूँ तुम्हें
मीलों दूर से भी

फुनगियाँ तो अब भी हैं
मेरे झरोखें में
कोपलों के संग
यादें भी चुन-चुन कर
सजायी हैं करीने से
किसी बच्चे के
खिलौने के माफिक
पर तुम ?

शुक्रवार, १७ जुलाई २००९

रहती थी यहाँ कुछ कविताएँ

'युवा' के पाठकों के लिए रविन्द्र दास का परिचय पुराना है. यह कविता उनकी अनुमति से यहाँ हम दे रहे हैं पाठकों के लिए. यह कविता हमने उनके 'अलक्षित' ब्लॉग से लिया है:

रहती थी यहाँ कुछ कविताएँ

वैसे ही , जैसे रहती थी दादी की कहानियों में परियां

पिछवाडे वाले कुँए में

और सच्चे-ईमानदार लोगों के लिए जुटाती थी सुख के सामान

वही परियां सज़ा भी देती थी

लालची और मक्कार लोगों को।

कहानी की परियां

जिन्हें हमने कभी देखा नही

लेकिन महसूस किया है बहुत बार

अपनी दादी के निश्छल आगोश में

नासमझ कल्लू के लिए स्वादिष्ट पकवान लाती हुई

कल्लू की उस सूखी रोटियों के बदले ।

उन्हीं परियों की मानिंद कविताएँ

हमारे मानवीय सरोकारों भूखी है बेहद

कभी जब आप बैठेंगे सुस्ताने को

किसी पेड़ के नीचे या कुँए की जगत पर

आ जाएंगी परियां

कविताओं की शक्ल लिये

गोया आपको न भाये उनका रूप

हो गईं हैं पीली और कमजोर

स्नेहिल स्पर्श के अभाव में

बिलखती रहती हैं दिन-रात,

नहीं पहचानी जाती है उनकी शक्ल

तभी तो चल पड़ा है कहने का रिवाज़

कि रहती थीं यहाँ कुछ कविताएँ

वैसे ही जैसे रहती थी जलपरियाँ दादी की कहानियों में।

सोमवार, १३ जुलाई २००९

तू

तब तू कितनी भोली थी,
जब आँखें तुमने खोली थी.

मृगनयनी तब तूने अंगडाई लेकर
कुछ उऊँ-माँ जैसा बोली थी.

आँखों-ही-आँखों में कटती थी रातें,
माँ-दादी व मौसी की
फिर भी उनकी उनींदी आँखों की
तू सबसे प्यारी हमजोली थी.

इस निष्ठुर, निर्मम भीड़-भरे निर्जन में
चहुँ ओर फैले ईंट-पत्थर के वन में,
तू माँ, बहना, सखी, मेरी मुंहबोली थी.
कितना भी गम हो चाहे इस दिल में,
तेरा तुतलाना मेरी ठिठोली थी.

बढ़ गयी पकड़ तू उंगली सबकी
अहसास कभी तुझे होने न दिया,
तू छोड़ चली जायेगी कभी हंसते-रोते
यह भास कभी होने न दिया.

पर दुश्मन जमाने ने तुझको
यह भेद आखिर समझा ही दिया,
तोड़ के प्यार के सब बंधन
लड़का-लड़की के खांचे में बिठा ही दिया.

कैसे अब तू गयी है बदल
ना जाने किन दुश्मनों की टोली थी,
मेरी प्यारी कैसे समझाऊं
तू आज भी मेरी वही हमजोली थी.

बरसों पहले जब तुमने
मृगनयनी सी आँखें खोली थी,
अंगडाई लेकर कुछ
उऊँ-माँ जैसा कुछ बोली थी.


(उन सभी माँ-पिता और परिवार को समर्पित जिन्होंने बेटे-बेटी में कभी भेद नहीं समझा)