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शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

तकदीर

टूटते देखा था हमने कभी मौज़ों को
साहिल से टकराकर,
किसी चट्टानी सुरंगों में घुसकर
गरजते - बिखरते
या फिर रेत के बियाबां में
भटककर गायब होते.
क्या गरजने वालों की तकदीर
कुछ ऐसी ही है
टूटने, बिखरने वाली?
मौज़ों ने चुपके से
कानों में आकर बस
इतना ही कहा -
अभी तुमने
ज्वार-भाटा
देखा कहाँ है ?

सोमवार, 13 जुलाई 2009

तू

तब तू कितनी भोली थी,
जब आँखें तुमने खोली थी.

मृगनयनी तब तूने अंगडाई लेकर
कुछ उऊँ-माँ जैसा बोली थी.

आँखों-ही-आँखों में कटती थी रातें,
माँ-दादी व मौसी की
फिर भी उनकी उनींदी आँखों की
तू सबसे प्यारी हमजोली थी.

इस निष्ठुर, निर्मम भीड़-भरे निर्जन में
चहुँ ओर फैले ईंट-पत्थर के वन में,
तू माँ, बहना, सखी, मेरी मुंहबोली थी.
कितना भी गम हो चाहे इस दिल में,
तेरा तुतलाना मेरी ठिठोली थी.

बढ़ गयी पकड़ तू उंगली सबकी
अहसास कभी तुझे होने न दिया,
तू छोड़ चली जायेगी कभी हंसते-रोते
यह भास कभी होने न दिया.

पर दुश्मन जमाने ने तुझको
यह भेद आखिर समझा ही दिया,
तोड़ के प्यार के सब बंधन
लड़का-लड़की के खांचे में बिठा ही दिया.

कैसे अब तू गयी है बदल
ना जाने किन दुश्मनों की टोली थी,
मेरी प्यारी कैसे समझाऊं
तू आज भी मेरी वही हमजोली थी.

बरसों पहले जब तुमने
मृगनयनी सी आँखें खोली थी,
अंगडाई लेकर कुछ
उऊँ-माँ जैसा कुछ बोली थी.


(उन सभी माँ-पिता और परिवार को समर्पित जिन्होंने बेटे-बेटी में कभी भेद नहीं समझा)